Posts

Showing posts from 2012

सर्दी

एक सीली रात के बाद की सुबह......

Image
नर्म लहज़े में
शफ़क ने कहा
उठो
दिन तुम्हारे इंतज़ार में है
और मोहब्बत है तुमसे
इस नारंगी सूरज को....
इसका गुनगुना लम्स
तुम्हें देगा जीने की एक वजह
सिर्फ  तुम्हारे अपने लिए...

सुनो न ! किरणों की पाजेब
कैसे खनक रही है
तुम्हारे आँगन में.
मानों मना रही हो कमल को
खिल जाने के लिए
सिर्फ तुम्हारे लिए.....

चहक  रहा है गुलमोहर
बिखेर कर सुर्ख फूल
तुम्हारे क़दमों के लिए....

जानती हो
ये मोगरा भी महका है
तुम्हारी साँसों में बस जाने को...

सारी कायनात इंतज़ार में है
तुम्हारी आँखें खुलने के...
जिंदगी बाहें पसारे खड़ी है
तुम्हें  आलिंगन में भरने को....

उठो न तुम...
और  कहो कुछ, इंतज़ार करती  इस सुबह से....
जवाब दो मेरे सवालों का...
सीली आँखें लेकर सोने वाले क्या उठते नहीं?
बातों का ज़हर भी क्या जानलेवा होता है ??
भावनाओं  में यूँ बहा जाता है क्या ???
कितनी गहरी नींद में हो तुम लड़की ????

जिंदगी  के दिये इन सुन्दर प्रलोभनों के सामने
कहीं मौत का दिया
मुक्ति का प्रलोभन भारी तो नहीं पड़ गया !!!

-अनु
१४/दिसम्बर/२०१२

शिकायत परिंदों से.....

Image
मेरे हाथ से छिटक कर
प्रेम बिखर गया है
सारे आकाश में..
देखो सिंदूरी हो गयी है शाम
तेरी  यादों ने फिर दस्तक दी है
हर शाम का सिलसिला है ये अब तो....
कमल ने समेट लिया
पागल भौरे को अपने आगोश में
आँगन  में फूलता नीबू
अपने फूलों की महक से पागल किये दे रहा है
उफ़ ! बिलकुल तुम्हारे कोलोन जैसी खुशबू....
पंछी  शोर मचाते लौट रहे हैं
अपने घोसलों की ओर.
उनका  हर शाम यूँ चहचहाते हुए लौटना
मुझे उदास कर देता है.
देखो बुरा न मानना....
मुझे शिकायत तुमसे नहीं
इन परिंदों  से है...
ये हर शाम
अनजाने ही सही
तुम्हारे न लौट आने के ज़ख्म को हरा कर देते हैं.....

-अनु 


नज़्म से प्रेम तक.....

Image
एक नज़्म पढ़ी
मेरी हँसी पर उसने....
मैं हँस पड़ी
वो बोला-
लो फिर एक नज़्म हुई....

मुझे छेड़ कर उसने 
एक शेर कहा
मैं गज़ल हुई....

दो लफ्ज़ रखे
अधरों पर उसने
मैं गीत हुई....

नगमें  गाये
मेरी आँखों पर
मैं भीग गयी....

कुछ छंद लिखे
मेरी बातों पर
मैं कविता हुई....

वो मौन हुआ 
बस छू कर गुज़रा
मैं प्रेम हुई......
-अनु

नारी सर्वत्र पूजिते.....

Image
(ई पत्रिका "नव्या" में प्रकाशित) 

दृढ़ है
अट्टालिका है
दुर्गा है
कालिका है
जिसने हिम्मत कभी ना हारी है
वो नारी है.....

सीता है
शक्ति है
मीरा है
भक्ति है
जिसने जप-तप में उम्र गुजारी है
वो नारी है......

सुकोमल है
सहृदयाहै
भगिनि है
संगिनी है
जो हर रिश्ते पर वारीहै
वोनारी है.......

क्रुद्ध है
क्षुब्ध है
व्यथित है
बेचारी है
जो कोख में गयी मारी है
वो नारी है......

अनु 


मुनिया

Image
("रूबरू दुनिया" के नवंबर अंक में प्रकाशित )


नन्ही सी मुनिया ने
करवट यूँ बदली थी....
उसने  अलसाए 
ख़्वाबों में
देखी एक झलकी थी...


वो  महलों में पलती 
नन्ही एक  रानी थी..

गहनों के ढेर लगे
दासी चांवर झलती थीं..
ढेरों उसकी सखियाँ
स्नेह बड़ा वे करती थीं 
पर भीतर उससे  जलती थीं..
यूँ सुखमय सा जीवन उसका 
वो फूलों पर चलती थी......


-ये मीठा  उसका स्वप्न ही था..
जो देख वो
खुद को छलती थी ,
अलसाए  ख्वाब की 
छोटी सी ये झलकी थी.
टूटी सी खटिया पर वो
बैठी आँखें मलती थी..


कहाँ की रानी...
कैसा  महल !!!!!
मुनिया तो
अपनी माँ की
पाँचवी अभागी लड़की थी,
दिन  भर खटती,
गढ़री पर सोती और
टुकड़ों पे पलती थी..


-अनु 

९/११/२०११

बावली नदी

Image
नदी हूँ मैंनदिया के जैसी ही चाहत मेरी है...समंदर! तू कितना खारा हैफिर भी मुझे जान से प्यारा है....
इतराती,इठलाती मेरी हर मस्ती पर तू रोक लगा देता है ठहरा देता है मुझे... पर मेरा मन तो तेरे लिए बावरा है समंदर ! तू मुझे जान से प्यारा है...
तुझ में मिल कर मैं भी खारी हो जाती नदी,नदी न रहती वो भी समंदर हो जाती.. मुझे मेरा अस्तित्व खोना भी गवारा है तू मुझे जान से जो प्यारा है...

अब न कोई फूल खिले मुझमें 
न प्यास बुझे प्यासे की मुझ जैसी जाने कितनी को तूने खुद में उतारा है मैंने  ये सच सहर्ष स्वीकारा है क्यूँकि एक तू ही मुझे जान से प्यारा है... 
-अनु 

प्रेम और जुदाई (दूसरी किश्त)

प्रेम की दूसरी किश्त तो जुदाई ही हो सकती है...कौन सा प्रेम है जिसने जुदाई का दर्द न भोगा हो.....जब जुदाई है तो दर्द है...और दर्द है तभी तो उपजी है कविता...

पहले मेरे दिल में तुम्हारा प्रेम पला करता था
अब तुम्हारे लौट आने की उम्मीद... तुम्हारे प्रेम से उत्सर्जित
पराबैंगनी किरणों ने
मुझे दृष्टिहीन कर दिया है...
नष्ट हो जाती है
प्रेमोन्माद में
ओजोन लेयर.......
(प्रेम ह्रदय में एक झूठी आस का दीप जला देता है.....और रोशन रहता है मन इस की लौ से)

तेरे जाने के बाद
जिए हैं मैंने
एक बरस में कई बरस..
कुछ साल
तुमसे
बड़ी हो गयी हूँ
उम्र में ..
अब तो मान लो मेरा कहा ..... (प्रेम याचक बना देता है कभी कभी,या शायद हमेशा...प्रेम देता अधिकार से है मगर इसके पास मांगने के हक़ नहीं हुआ करते...)
तय होती है सबके हिस्से की ज़िन्दगी जन्म के पहले से ही.... तेरे साथ उन चंद सालों में जी ली मैंने

प्रेम और जुदाई (पहली किश्त )