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Showing posts from March, 2012

व्यथा

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मुझे तलाश है
एक कविता की,
जो प्रवाहित हो
निर्बाध,
ह्रदय से मेरे...
बुझा दे तृष्णा मेरी 
बुझा दे तृष्णा तेरी.....

तलाश है मुझे उस सरिता की....

ना जाने क्यों
इन दिनों
शब्द नहीं सूझते...
भावों के दलदल से
पार निकलने को
बस गीत रहे जूझते...

ना प्रभु वंदन लिख पाऊं
ना मन का कोई
क्रंदन लिख पाऊं...
महका दे कागज़
ऐसा ना चन्दन लिख पाऊं !
न राग-अनुराग
न ह्रदय की कोई
अनबन लिख पाऊं..
न काशी न मथुरा
न मन का वृन्दावन लिख पाऊं !

बंजर हो चली है
ह्रदय  की भूमि....
सूखे  रक्त से
शब्दों  की सरिता कैसे बहाऊं???
कोलाहल है भीतर....
ऐसे में  भाव कैसे उपजाऊं .......
व्यथित मन की तृष्णा कैसे मिटाऊं........


-अनु 

मैं आकाश हूँ....

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देखा है क्या तुमने
अनंत आकाश की ओर ? 
जो मानो धरती को खुद में
समेट लेना चाहता है...
गर्वान्वित...अडिग.....विस्तृत....

वो मैं हूँ...
सूरज की  किरणों से उज्जवल
कभी बूंदों का हार पहने..
सजा कभी इन्द्रधनुषी रंगों से
दुल्हन सा रूप धरे  ! 


रात को देखना मुझे...
तारों की जगमग बारात लिए,
चाँद का अनुपम टीका लगाये
वाह ! कैसी सजधज है..

मगर कभी सुन कर देखना
उस विस्तार में छिपी नीरवता को..
महसूस करना 
वो एकाकीपन....
देखना मुझे-
इस चाँद-सूरज और तारों के बिना


एक स्याह चादर के सिवा
मै कुछ नहीं...


-अनु 



बेबसी

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ना जाने कितनी
अनगिनत
स्याह रातों की
कालिमा पर
आस के नन्हें-नन्हें 
सितारों को
सिया उसने.....


सूनी सपाट
जिंदगी  के
भयावाह सन्नाटों को
जिया उसने....


सिर्फ एक
छोटी सी
प्यास की खातिर
सर्द रातों में
घने अन्धकार का
कसैला जहर
पिया उसने....


वो प्यास थी,
वो आस थी......
कि टूटेगा
आसमां से कभी
एक तारा..
दिखेगा उसे 
वो अदभुद नज़ारा  ...
तब  वो 
चट से मांग लेगी
बरसों पुरानी मुराद...


होगी फिर
एक नयी सुबह
उस रात के बाद ............................


-अनु 



प्यार क्या है ??

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१- प्यार इन्द्रधनुष है-
    जब है तो रंगीन
    लुभावना...   
    मगर रहता कहाँ है टिक कर???


२-प्यार बेर है-
   कभी खट्टा
  कभी मीठा
  अकसर कीड़े वाला
  तभी ना शबरी ने चख चख कर खिलाए !!!


३-प्यार नारियल है-
  जितना भीतर जाएँ
  उतना मीठा और नर्म...
  मगर बाहर से सख्त इतना कि भीतर जाएँ कैसे????


४-प्यार भगवान है-
   मानों तो है,
   न मानों तो नहीं....
  दिखता मगर किसी को नहीं है.........


५-प्यार लॉटरी है-
   कभी लगी
   तो कभी नहीं...
   यहाँ सारी गणनाएं फेल हैं.


६-प्यार एब्स्ट्रेक्ट पेंटिंग है-
   जिसने किया वही समझा
   बाकियों के लिए अर्थहीन/बकवास...
   और कुछ समय बाद, जिसने किया  उसके लिए भी अर्थहीन.....


७-प्यार ताजमहल है-
   खूबसूरत
   आलीशान
   भीतर की मुर्दानगी दिखती कहाँ....


  -अनु 
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दरख़्त

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एक रिश्ता  है..
मानों फैला हुआ दरख़्त. दूर दूर तक पसरी शाखायें. कितना  सुकून था कभी उसके साये तले जीने में............ मगर अब बीमार हो गया वो, पत्ते बेजान.. न फूल न फल
सिर्फ  कांटे..
अविश्वास का दीमक
खा रहा है जड़ों को.... उखाड फेंक दिया जाये क्या???

अब एक पेड़ तो काट भी दूँ... मगर उसकी जड़ों से जुड गयीं हैं बरस-दर-बरस कई और छोटे बड़े,करीबी पेड़-पौधों की जड़ें.. जैसे  कई रिश्ते जुड़ते चले जाते हैं किसी एक रिश्ते के साथ.. जंज़ीर की कड़ियों की  तरह.. अब  एक साथ कितनी जड़ें खोदूं... अपने साथ किस किस को घाव दूँ???


सोचती हूँ इंतज़ार करूँ....


सो सींचती हूँ हर दिन उम्मीद लिए...
जाने कब 
शायद कोई ऐसा मौसम आये 
जो इस सूखे दरख़्त पर भी 
फल-फूल खिलाए....


-अनु 


आखिर क्यूँ ???

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सदियों से कभी 
सुध ली ना उसने....
फिर आदत सी हो गयी 
उसके बिना  जीने की ,
बिना किसी शिकवे शिकायत के.........
अब उम्र के
इस आखरी पड़ाव पर...
जाने क्यों
हर आहट पर
निगाह चली जाती है
उस बंद किवाड पर.
हैरान  है 
खुद पर ..
अपनी इस सोच पर-
कि जिसके बगैर
चलते  रहे 
यूँ तनहा
सारी उम्र..
बिना जिसके सहारे के
गुज़ार ली
ये पहाड़ सी जिंदगी...
अब इस अंतिम यात्रा के लिए
उसका कांधा
इतना
लाज़मी क्यूँ है???
जीने के लिए नहीं...
तो मरने को सहारा क्यूँ???


-अनु 
११/११/२०११ 

जीवन चक्र

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इंसान अपनी परेशानियों से कितना घबराया रहता है........जबकि  जानता है कि यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं............और जो होना है उस पर कोई वश नहीं...........जो मिलना है उससे कोई वंचित नहीं रहता.......फिर भी परेशां ???????
अपनी डायरी के पन्ने पलटते हुए अक्सर  मैंने पाया कि कई दिन मैंने उन परेशानियों की फिक्र करते गुज़ारे जो   कभी आयीं  ही नहीं........................

अब तक जैसे कटता आया,
आगे भी कट जाएगा
जो चलता है...चलते-चलते
एक रोज गुजर ही जायेगा...


लोभी मन की अभिलाषायें
मन गढ़ ढेरों जिज्ञासाएँ
इन उलझी को सुलझाने में
भव-सागर तर जाएगा...


फूलों की हो सेज पे चलना
या काँटों से दामन छिलना
जो लिखा हुआ हो भाग में तेरे
मिलता है,मिल जाएगा...


हर दिन सूरज के संग उगता
दिन भर धूप की आग में तपता
सूरज के संग इक दिन तू भी
अस्ताचल को जाएगा.....

जो चलता है...चलते चलते
इक दिन तो गुजर ही जाएगा...
बस माटी में मिल जाएगा ...


अनु ..









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क्या है मेरे पास
सिवा मेरे सपनों के... बिछा दिये हैं मैंने, 
सभी तुम्हारे क़दमों में ज़रा आहिस्ता चलना
कहीं कुचल  ना जाएँ..
ये प्यार का पागलपन ही तो है जो इतनी हिम्मत देता है कि आप अपने अनमोल सपने किसी के क़दमों में डाल देते हैं, फिर इन्तेज़ार करते हैं कि वो उन्हें उठा कर आपकी पलकों पर सजा दे या यूँ ही गुजर जाये उन पर से, मानों कुछ हुआ ही न हो........ फिर चाहे आप बटोरते रहें किरचें सारी उम्र.........बेमकसद............क्यूंकि उन किरचों को जोड़ कर सपने दोबारा बनाने का हौसला कहाँ बचता है!!! बस  कर बैठते हैं अपनी उंगलियां लहुलुहान......और फिर उस खून से लिखी जाती हैं डायरियां..........रंगे जाते हैं पन्ने........शायद यूँ ही होता है नज्मो/ग़ज़लों/कविताओं का सृजन............. रोशनाई से लिखी इबारतों में कहाँ वो कशिश होती है...........
                                     हम क्या बनाएँ  बीती बातों का फ़साना
                                                    आखिर  कब लौटा है कोई गुज़रा ज़माना...

                                      -अनु




यात्रा...

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दिन भर की 
भाग दौड के बाद
घर लौटा .... 
तकरीबन
सब कुछ
व्यवस्थित सा था...
रात  बेहद सर्द थी 
मगर
बिस्तर नर्म
और कमरा गर्म था.....
फिर भी
सारी रात
करवटों में गुज़री
जाने क्यूँ
नींद नहीं आई
शायद यात्रा की 

थकन ज्यादा थी...

माँ को बहुत दूर
वृद्धाश्रम
जो छोड़ आया था....

ऐतबार

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मेरी डायरी के पन्ने नीम की डालियाँ हो गए है तुम्हारी वजह से..........इतनी कड़वाहट आखिर क्यूँ भर दी?? नन्हा सा प्यार का पौधा रोपा था मैंने.........तब कहाँ जानती थी कि ये नीम का है.........पीला रसीला फल खाया तब जाकर एहसास हुआ.........काश कि  कोंपलें ही चख लेती......और तभी जान जाती तो शायद जड़ें गहरी होने से पहले ही उखाड देती........


मुझे ऐतबार नहीं रहा तुम्हारा.
   तुम्हारी वजह से 
अब नहीं रहा ऐतबार
  किसी का  भी...................
अब अपनी चाहत का
  कोई हिस्सा-बाँट नहीं करती.
करती हूँ मोहब्ब्त खुदी से
  खुद से ही रूठा करती हूँ
खुद के  मनाने से  झट 
  मान भी जाया करती हूँ मैं.
गले लगाती हूँ खुद को ही......

किसी गैर को ये हक़ मैं दे नहीं सकती.
अब ऐतबार जो नहीं रहा 
  किसी पर भी,
तुम्हारी वजह से.................



-अनु 


रिहाई.

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नागवार गुज़रा मुझे
उसका यूँ चले जाना....
चोट लगी, दिल पर 
और अहम् पर  भी ...
लहुलुहान से मन ने मन्नतें मांगी
रोया गिड़गिडाया मेरा आहत ह्रदय.. आंसू बहाते बहाते मंदिरों की सीढियां भी धो आया..
न सुनी उसने, न मेरे खुदा ने...
न वो आया, न खुदा आया...


कड़वा हो चला मन ,बहुत तिलमिलाया...
पीपल पर मन्नत के धागे बांधे तांत्रिक-पंडित तंत्र-मंत्र सबकी राह पकड़ी..
टोने टोटके जादू जंतर सब फूंके..
मगर सब दिल को बहलाने के चोचले निकले..
न सुनी उसने, न मेरे खुदा ने...
न वो आया, न खुदा आया....


थक हार कर अनमने से मेरे मन ने भी
भुला दिया उसको...
भुला दिया उसके ता-उम्र साथ के वादे को मुक्त कर दिया उसको मेरी यादों ने........
और मुझको भी मिली आज़ादी, मोहब्बत की उम्र कैद से ......... मुझे मेरे अच्छे व्यवहार के कारण शायद जल्द रिहा कर दिया गया था.
अनु 

10/8/2011



JIGSAW PUZZLE.......

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पता नहीं डायरी  के ज़्यादातर पन्ने उदास क्यूँ होते हैं???? या शायद हम उदासी में ही अपनी भावनाएं कागज़ पर उतारते हैं....क्योंकि खुशियाँ बांटने वाले तो कई मिल जाते हैं........ सो पढ़िए- मेरा और एक उदास दिन.
जिंदगी हमारी अकेले की नहीं होती...........ये तो एक jigsaw puzzle की तरह है जिसमें कई टुकड़े जुड़े होते है.........हर टुकड़ा अलग रंग का,अलग ढंग का. एक टुकड़ा इधर उधर हुआ तो तस्वीर अधूरी और अस्पष्ट मालूम होती है...हर हिस्से  की  अपनी जगह भी है अपना महत्व भी........जिंदगी कोई हेर-फेर स्वीकार  नहीं करती.... जैसे  आसमां में चमकते सप्त-ऋषि  से एक तारा हट जाये तो क्या उनकी पहचान बचती है???? या इन्द्रधनुष कभी छह रंगों से बन सकता है???? वैसे  ही मेरी तस्वीर अधूरी है तुम्हारे चले जाने से ....   तुम्हारे बिन, परेशां मैं....परेशां हर लम्हा........रात आँखों में कटती है....... सो भी जाऊं तो मेरी रूह जागती रहती है.........शायद खोजती होगी तुम्हें......... तुम्हारी तस्वीर भी तो होगी कुछ अटपटी ???? या कोई बिलकुल मुझ सा टुकड़ा तुमने फिट कर लिया  है अपने puzzle को पूरा करने के लिए ?????? नहीं नहीं......मुझ सा कहाँ पा…

तेरे बिन ...."मैं "

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खामोश रहती हूँ पथराई लगती होंगी आँखें मत समझना कि खफा  हूँ बस चुप हूँ मैं ..... क्योंकि कुछ कहा तो रुसवाई तुम्हारीहोगी~~~~~
हँसती हूँ,खिलखिलाती हूँ खोखलापन लगता होगा  मत करो सवाल, मान  लो   बस खुश हूँ मैं  .....   क्योंकि  उदास रहूंगी तब भी होंगे सवाल कई~~~~~
तुम चले गए तो क्या अकेली नहीं हूँ मैं ! कोई बेशक समझे, तुम नहीं हो- अब "तुम" हूँ मैं..... क्योंकि अकेले कब तक जिया जा सकता है~~~~~
यादों के दरीचों से अब आती नहीं रौशनी या आवाज़ साया भी नहीं दिखता  वहीँ गुम हूँ मैं..... क्योंकि भीड़ में यादें भी साथ नहीं रहतीं~~~~~
-अनु 



खुशियों का गणित

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मेरी डायरी में आपको सब कुछ मिलेगा.....
किस्से/कहानी, गम/खुशी, सच/झूट, जिंदगी/मौत............कई सवाल और कई नुस्खे भी.....
आज आपको देती हूँ खुश होने  का एक नुस्खा.....
कोई बात नहीं  अगर आप  पहले ही खुश है.......हो सकता है आपका पढ़ना  मेरी खुशी के लिए ज़रूरी हो....
वैसे खुश होना कौन सा मुश्किल काम है.......मैं एक फूल खिला देख खुश हो जाती हूँ.....आप शायद केलेंडर में लाल रंग से SUNDAY  लिखा देख ही झूम जाते हों!!!!!
एक सुबह कुछ यूँ करिये कि कुछ देर सूरज को निहारिए.......चिड़ियों को शोर मचाते सुनिए..........देखिये कहीं हरसिंगार ना बिखरा पड़ा हो......समेट लीजिए कुछ..........
मंदिर से आती घंटियों की आवाज़ का पीछा करिये........चाहे तो प्रभु से कुछ शिकायतें भी कर लीजिए.........मन हल्का हो जाएगा...
किसी पुस्तक की दुकान में घंटो पुस्तकें टटोलिए....एक-आध खरीद भी लें.........दुकानदार को भी खुश होने दीजिए ना.......एक फोन कॉल आपको बहुत खुशी दे सकता है.........मिलाएं  किसी पुराने दोस्त का नंबर.......या मां के हालचाल ही पूछ लें........क्यूँकि  मां खुश तो आप खुश.........
शाम किसी तालाब/पोखर/समंदर/नदिया के किनारे…

चुभन.....

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कुछ दरका सा
भीतर मेरे,
तड़का हो जैसे
शीशा.
चुभती किरचन-
बढती टीस
लहुलुहान  अंतर्मन.......
और  आहत सा ये   जीवन !


डगमग सा अस्तित्व मेरा
है स्तब्ध खड़ा...
अपने न होने से
मानो मुंह औंधे गिरा..


ये प्रश्न मेरे न होने का
तब हुआ खड़ा......
जब मन  का पंछी नील गगन में उड़ा ज़रा....
- तब पर कतरे मेरे अपनों ने
डैनो पर  जिन्हें बिठा मैं खूब उडी थी .....


एहसास चुभन का 
तब जाकर हुआ बड़ा..
जब आस लगी आगे बढ़ने की....... - तब डाली बेड़ियाँ पैरों में उनने 
जिनको ढो काँधे पे,  मैं मील चली थी .....


आभास घुटन का  हुआ बड़ा 
जब हलक से निकले  स्वर विरोध के
- तब कटी जुबां उन हाथों से
जिनको जीवन के गीत दिए थे .....


सो अब समझी
  जब ज़ख्म मिले ,
क्यों दरका कुछ  भीतर मेरे...
  क्यों दर्द हुआ....


-अनु 




प्रेम के क्षण और क्षणिकाएं प्रेम की.....

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अभी-अभी 
छू कर गयी जो मुझे बसन्ती बयार थी  या तुम थे ??? ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कतरा कतरा थी जिंदगी  पाया तुम्हें तो  हो गयी नदी, मीठे पानी की.......... ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

तुमसे जुड़ी हर बात मधुर है  तुम्हारा स्पर्श,खुशबू,आवाज़ सब....... तुमने रुलाया तो  आँख से निकला पानी भी  मीठा था............ ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अनु 

रफ़्तार..............जीवन की.

क्यूँ  तेज भाग  रहे हो तुम ??
इतनी रफ्तार  क्यूँ?
हार का भय है............
गिरने का भय नहीं ???


कितना बटोर रहे हो तुम ??
इतना लोभ क्यूँ?
कमी का भय है..........
पाकर खोने का नहीं????


कितना बड़ा बनना है तुम्हें ??
इतनी तृष्णा क्यूँ?
विपन्नता  का भय है...........
नीचता का नहीं ???


कितना ऊंचा उठना है तुम्हें ??
इतनी उड़ान क्यूँ?
ज़मीन से भय है...........
मिट्टी में मिल जाने का  नहीं???


कितना आगे जाना है तुम्हें??
इतनी प्रतिस्पर्धा क्यूँ?
पीछे रह जाने का भय है.......
खुद से बिछड़ जाने का  नहीं????
बस करो !!!! ठहरो ज़रा !!!!! थोडा जी भी लो...............

मस्ती का आलम

जाने कितनी खट्टी-मीठी यादें जुड़ी होती हैं हर त्यौहार से........कुछ भूल बिसरा याद भी आता है,.............आपके लिए आज बस ये कविता...............मेरी डायरी बंद है................आप भी अपनों के साथ खुशियाँ बाँटें........और जो साथ नहीं हैं उन्हें याद करें.......
चलिए त्यौहार मनायें ......रंग उडायें..........  मस्त मलंग बन जाएँ..... 


मीठी चली बयार
बिखरे रंग हज़ार
          फागुन आया रे.........


फैला अबीर गुलाल  छलका आँखों से प्यार
           फागुन आया रे........


महका सारा आलम है
बहका है संसार
          फागुन आया रे........


यारों में अब खूब बनी
भूले हर तकरार
          फागुन आया रे.........


अपनों की फिर याद आई
जो रहते  सागर पार
          फागुन आया रे........


आँखें नम हो जाती हैं 
क्यूँ छोड़ा घर- बार 
           फागुन आया रे.........


-अनु 



उम्मीद .........

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तुमने जो रोपा था पौधा उसमें नन्ही नन्ही कोंपलें फूट रही है....
कहीं कोई संकेत तो नहीं है ये सृष्टिकर्ता का.......जब से तुम गए हो अलविदा  कह कर ,तब से तुम्हारे इस पौधे की सब पत्तियां पीली पड़ गयीं......शायद मुझसे मुकाबला करने लगीं थीं.......जैसे मेरा चेहरा लोगों को मुरझाया ज़र्द  सा लगता था..........बड़ा गुस्सा आता था मुझे.....और मैं या तो आइना देखती नहीं थी या फिर गहरा सा मेकअप पोत लिया करती.........खुद के लिए नहीं  तो कम से कम दुनिया को दिखाने के लिए खुश रहा करती........याने कोशिश तो किया ही करती.......
फिर उस पौधे की पत्तियां झड गयीं एक एक करके..........जैसे जब-तब मेरी आँखें झरा करतीं थीं..........
कितनी कोशिश की मैंने उस पौधे को हरा रखने की ..........मगर कोई फायदा नहीं हुआ......वैसे ही मैं हमारे रिश्ते को ना बचा पायी...........
 कुम्हलाया सा वो पौधा...और वैसी ही मैं.........बस जिंदा थे दोनों.........जाने क्यूँ मरे नहीं......
अब जाने कहाँ से ये कोंपलें फूटी हैं..............तुम आओ ना आओ ,मुझे तो आदत है इस पौधे की तरह हो जाने की.....सो जान लो तुम भी, कि आजकल  हम भी लहलहाते से फिरते हैं...…

वो सीला सा पन्ना...............

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क्या लगता है आपको कि डायरी का हर पन्ना महकता होगा????
ऐसा जीवन हुआ है क्या कभी किसी का??? 
कि हर पन्ना गुलाबी हो!!!!


आज वो सफहा आपके सामने है जो अब तक सीला सीला है...कुछ खारापन लिए.....


किस कदर  खफा थे  तुम मुझसे.....इतना गुस्सा भी कोई करता है भला??? जब प्यार जताने की  बारी आती तब तुम कहते "मुझे प्यार जताना नहीं आता".............हाँ भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति भी तो एक कला होती है......मैंने स्वीकार कर लिया कि तुम्हारे पास ये कला नहीं है......इसलिए ही तुम कभी कह नहीं पाए कि मैं कितनी ज़रूरी हूँ तुम्हारे लिए....या मैंने क्या क्या किया तुम्हारे लिए,तुम्हारे घर ,तुम्हारे परिवार के लिए.......
उम्मीद  करती रही कि तुम्हें भीतर कही एहसास ज़रूर होगा बस!!!
मगर उस रोज जब तुम्हें गुस्सा आया तब तुमने मुझे भीतर तक बींध डाला अपने ज़हर बुझे शब्दों के बाणों से.......जाने कहाँ से तुम्हारे पास अभिव्यक्ति की  वो कला आ गयी थी कि मेरे हौसले पस्त हो गए........
मेरी एक भूल को तुम्हारे क्रोध ने कई गुना  कर मुझे अपराधी बना डाला..........और मैंने सहम कर हर इलज़ाम कबूल किया......


कितना बोले तुम........
और यूँ ही…

रसीली स्ट्राबेरी

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आज जो पन्ना खुला उससे बड़ी भीनी सी खुशबु आ रही है........शायद कुछ मोहब्बत का ज़िक्र होगा इसमें........चलिए रूमानियत के सफर पर लिए चलती हूँ आज.
बड़ा लंबा सफर तय किया हमने एक साथ,और तुम कहते हो  पता ही नहीं चला .....शायद यही मोहब्ब्त की निशानी होती है कि वक्त का एहसास ही ना हो....... मगर मैं इस ख़याल पर ज़रा ठहरूं और थोडा सोचूं तो फिर ये कहूँगी कि मैंने तो हर लम्हा महसूस  किया.....हर पल का एहसास था मुझे.....हर क्षण जिया मैंने तुम्हारे साथ........ बरस के पूरे 365 दिन तुम और तुम्हारे ख़याल से लिपटी रही हूँ मैं......कभी लिपटे थे तुम किसी रंगीन/गुलाबी  कागज़ की तरह.....मानों "गिफ्ट रैप्ड"...जो महकता हो भीनी भीनी खुशबु से....कभी दिन गुज़रा मानों पुराने अखबार में लिपटा सा.... जो भी हो,बड़ी  लंबी दूरी  तय की  हमने.......और बाकी है अभी  बहुत कुछ....... आने वाला कल.......उसकी आस....... हमें सदा ऊर्जा से भर देती है.......

मन में भविष्य की मीठी उम्मीद पल रही हो तो वर्तमान भी हसीन लगता है... जैसे लाल रसभरी स्ट्राबेरी की आस में ,हरी  हरी स्ट्राबेरी देख भी हम पुलकित हो जाते हैं....


-अनु 

आत्मकथा....सत्यकथा नहीं....

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कई प्रसिद्द आत्मकथाए पढ़ने के बाद ख़याल आया कि क्यूँ ना मैं भी आत्म कथा लिखूं.......क्या पता भाग्य में इसी तरह प्रसिद्ध होना लिखा हो.......... कोशिश करने में क्या हर्ज है.........मगर जब लिखने बैठी तो एहसास हुआ कि आसान नहीं है आत्मकथा लिखना क्योंकि आसान नहीं है सच कहना.......क्यूंकि सच की अकसर बड़ी कीमत चुकानी पडती है.......और कहीं ऐसा न हो कि मुझे महंगा पड़ जाये ये प्रसिद्धी का चस्का......... सो ये विचार तो ताक पर रख दिया...और मन बनाया कहानी लिखने का......जो दरअसल मेरी ही कहानी थी मगर चूँकि कहानी थी इसलिए सत्यता की कोई गारंटी भी नहीं थी.......ना मेरी कोई नैतिक ज़िम्मेदारी ही बनती थी.....सो तय ये हुआ कि कहानी में जो हिस्सा हसीन  होगा उसे सत्य मान  लिया जाये.....और जो ऐसे-वैसे/अनैतिक/अभद्र/स्तरहीन  से लगें, वे तो फिर कहानी का हिस्सा हैं ही... अब कोई पाठक इसको पढ़े ही क्यूँ??? तो सोचिये कि आप कोई कथा पढ़ रहे हैं......जिसमे हर समय ये रहस्य बना रहे  कि ये सच है या नहीं????और सभी मसाले तो होंगे ही..... कहिये पढेंगे ना???? बस अब समेटती हूँ अपनी डायरी के पन्ने और गढती हूँ एक कहानी.....कुछ खट्टी ,कुछ म…