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Showing posts from August, 2013

स्मृतियाँ

माँ के ज़ेवरों की तरह
सम्हाल रखी हैं मैंने
तुम्हारी बातें,
सहेज रखा है हर महका लम्हा
रेशम की लाल पोटली में !

सम्हाला है
स्मृतियों को
एक विरासत की तरह
अगली पीढ़ी के लिए!

कभी खोल लेती हूँ वो पोटली
देखती हूँ चमकते गहने
और
आँखों में हौले से उतर आते हैं वो मोती...

ख़ालिस सोने की बनी-
सच!!
बुरे वक्त का सहारा  हैं वे स्मृतियाँ
माँ के ज़ेवरों की तरह......
~अनु~





मैं तुम्हें फिर मिलूंगी........

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प्रतिष्ठित पत्रिका "आधी आबादी" के अगस्त अंक में  अमृता प्रीतम जी पर मेरा लेख
लेख लिखने का यह पहला प्रयास था मेरा....

इमरोज़ ठीक ही कहते हैं कि उसने जिस्म छोड़ा है,साथ नहीं छोड़ा.वाकई कुछ रूहें जिस्म से जान निकल जाने के बाद भी आबाद रहती हैं और मोहब्बत करने वालों के दिलों में होता है उनका बसेरा. हिंदी और पंजाबी साहित्य की ऐसी ही एक बेहद रूमानी शख्सियत से आपको रूबरू करवाती हूँ,जो जितनी खूबसूरत थीं उससे कहीं ज़्यादा हसीं और ज़हीन थे उनके शब्द. आइये मिलते हैं “अमृता प्रीतम” से,मेरी कलम के जरिये....
अमृता,जिन्होंने कच्ची उम्र से ही अपने सपनों की इबारत लिखनी शुरू कर दी थी, जिंदगी के सफ्हे पर रोशनाई कभी जिगर का खून था तो कभी आँसू.अमृता कहती हैं-“मेरा सोलहवां वर्ष आज भी मेरे हर वर्ष में शामिल है”,शायद इसीलिए उनकी नज्में और कहानियाँ प्रेम को इतनी पूर्णता से परिभाषित कर पाती हैं. अमृता की ज़िन्दगी को साल दर साल  लिख पाना मुश्किल है क्यूंकि किसी एक एहसास को पन्ने पर उतारती हूँ तो कोई कोई गुजरा एहसास फिर दस्तक देता है या आने वाला कोई एहसास सामने खड़ा हो जाता है.मेरे ज़हन में गुत्थमगुत्था इन एहसास…

अकेलापन

अकेली राह मुश्किल नहीं
खुद का बोझ ढोना जायज़ है,
ज़रुरत है...
जब मौका मिला किसी पेड़ के नीचे सुस्ता लिए
खुद को अपने से परे रख कर !

ज़ख्मों को ख़ुद सीना सीख जाते हैं हम
यूँ अकेली राह में ज़ख्मों की गुन्जाइश कम होती है...
राह में कोई ठंडे पानी का सोता मिलता ही है ज़ख्म धोने को
प्यास बुझाने को.....

जीने की कोई वजह खोजने का वक्त नहीं मिलता
अकेलपन की अपनी मसरूफ़ियत है
और कट जाती है जिंदगियाँ यूँ ही अक्सर, बिना जिए ही.
धूप खुशबू हवाएं मिल ही जाती हैं सबको अपने अपने हिस्से की.....

(आप जब अकेले होते हैं तब ख्यालों की भीड़ लग जाती है,ऐसे ही....... )
~अनु ~

शब्द

कहा गया हर शब्द
स्थायी है
हर अक्षर होता है कालजयी...
शब्द के सृजन की प्रक्रिया अपरिवर्तनीय है...
एक बार बन जाने के बाद
शब्द भटकते हैं,
खोजते हैं ठौर...कहीं ठहर जाने को.

शब्द कभी मरते नहीं
शब्दों के दिए घाव कभी भरते नहीं....
मेरे कानों से टकराए हैं ऐसे कई शब्द
और उन्होंने स्थायी ठिकाना बना लिया
मेरे मन को...
एक के ऊपर एक
परत दर परत टिकते ये शब्द
रौंदते मेरी शिराओं को...
इनसे रिसता धीमा ज़हर फ़ैल रहा है पूरे बदन में

दर्द असह्य हुआ
तो नोच नोच कर शब्दों को उठा कर
सृजन किया एक नज़्म का...
चूंकि हर शब्द तेरा है
सो दर्द भरी इस नज़्म का सेहरा तेरे सर.....
~अनु~