Posts

Showing posts from October, 2013

स्मृतियाँ

मेरी इस कविता को सुन्दर स्वर दिए हैं दीपक सिंह जी ने ...आप भी सुनिए..सराहिये......
https://soundcloud.com/topgundeepak/smritiyaan

तुम्हारी स्मृतियाँ पल रही हैं 
मेरे मन  की
घनी अमराई में |
कुछ उम्मीद भरी बातें अक्सर 
झाँकने लगतीं है
जैसे
बूढ़े पीपल की कोटर से झांकते हों
काली कोयल के बच्चे !!

इन स्मृतियाँ ने यात्रा की है
नंगे पांव
मौसम दर मौसम 
सूखे से सावन तक 
बचपन से यौवन तक |

और कुछ स्मृतियाँ तुम्हारी 
छिपी हैं कहीं भीतर
और आपस में स्नेहिल संवाद करती हैं,
जैसे हम छिपते थे दरख्तों के पीछे
अपने सपनों की अदला बदली करने को |

तुम नहीं 
पर स्मृतियाँ अब भी मेरे साथ हैं 
वे नहीं गयीं तेरे साथ शहर !!

मुझे स्मरण है अब भी तेरी हर बात,
तेरा प्रेम,तेरी हंसी,तेरी ठिठोली
और जामुन के बहाने से,
खिलाई थी तूने जो निम्बोली !!

अब तक जुबां पर
जस का तस रक्खा है
वो कड़वा  स्वाद 
अतीत की स्मृतियों का !!

-अनुलता-

इंदिरा -आधी आबादी पत्रिका में प्रकाशित मेरा आलेख.

Image
लेख लिखना न मेरे बस का था न शौक में शामिल था ....एक प्रतिष्ठित पत्रिका "आधी आबादी " के लिए पहली बार लेख लिखा "अमृता प्रीतम "पर | भरपूर सराहना मिलने पर अब "आधी आबादी" के लिए हर माह एक आलेख लिख रही हूँ और लिखते लिखते खुद से सीख रही हूँ |
राजनीति और नेता कभी मेरी पसंद नहीं रहे मगर फिर भी पत्रिका की मांग पर अक्टूबर अंक के लिए इंदिरा गाँधी  पर लिखा | वे इकलौती राजनेता थीं जिनके व्यक्तित्व ने मुझे प्रभावित किया था | 
आशा है आलेख आपको पसंद आएगा -


इंदिरा प्रियदर्शिनी
(19 नवम्बर 1917- 31अक्टूबर 1984)

छोटी सी थी मैं,कोई 14-15 बरस की जब अपने पिता की उँगलियाँ थामे भोपाल शहर की एक सुन्दर सड़क के किनारे खड़ी इंदिरा जी की रैली का इंतज़ार कर रही थी. खुली जीप में , पीली साड़ी में हाथ हिलाती उस गरिमामयी छवि ने मेरे मन में तब से ही घर कर लिया था.उन्होंने अमलतास के फूलों का एक गुच्छा मेरी ओर फेंका,एक पल को उनकी नज़र मुझ पर भी पड़ी थी. बस तब से इंदिरा गाँधी कई और लाखों लोगों की तरह मेरी भी पसंदीदा राजनेत्री बन गयीं.
बेहद आकर्षक और चुम्बकीय व्यक्तित्व की स्वामिनी इंदिरा जी को मैंने पह…

शक्ति हो तुम !

Image
दैनिक भास्कर -मधुरिमा- में प्रकाशित मेरी कवर स्टोरी 9 अक्टूबर 2013
 http://epaper.bhaskar.com/magazine/madhurima/213/09102013/mpcg/1/


पौराणिक और प्रागैतिहासिक काल से आरम्भ करते हुए यदि आज तक स्त्रियों के विषय में विचार करें तो सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा से लेकर, वैदिक काल की अपाला,घोषा, सावित्री और सूर्या जैसी ऋषिकायें, उपनिषद काल की गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियाँ , मध्यकाल और पूर्व-आधुनिक काल की अहिल्या बाई, रज़िया सुल्तान, लक्ष्मी बाई और चाँद बीबी जैसी शासक सम्पूर्ण नारी शक्ति को बेहद सुन्दर और सशक्त रूप से परिभाषित करती हैं |
फिर इतने गौरवान्वित इतिहास वाली नारी उन्नीसवीं सदी के आते आते इतनी अधिकारविहीन और निर्भर कैसे हो गयी ? आखिर नारीवाद के तहत नारियों के उत्थान की आवश्यकता हुई क्यूँ ?
“शक्ति रूपी” दुर्गा याने दुर्ग, अर्थात अभेद्य | जो सुरक्षित है जो शक्तिशाली है, ईश्वरीय है, श्रेष्ठ है और  जो माँ है | दुर्गा शिव की ऊर्जा हैं उनकी अभिव्यंजना हैं | शिव स्थिर और अपरिवर्तनीय हैं , ब्रह्माण्ड की प्रक्रियाओं से अप्रभावित हैं,इसलिए दुर्गा ही कर्ता हैं जो मानवजाति की पाप और विपत्तियों से…

सिंदूर

Image
किसी ढलती शाम को
सूरज की एक किरण खींच कर
मांग में रख देने भर से
पुरुष पा जाता है स्त्री पर सम्पूर्ण अधिकार |
पसीने के साथ बह आता है सिंदूरी रंग स्त्री की आँखों तक
और तुम्हें लगता है वो दृष्टिहीन हो गयी |
मांग का टीका गर्व से धारण कर
वो ढँक लेती है अपने माथे की लकीरें
हरी लाल चूड़ियों से कलाई को भरने वाली  स्त्रियाँ
इन्हें हथकड़ी नहीं समझतीं ,
बल्कि इसकी खनक के आगे
अनसुना कर देती हैं अपने भीतर की हर आवाज़ को....
वे उतार नहीं फेंकती
तलुओं पर चुभते बिछुए ,
भागते पैरों पर
पहन लेती हैं घुंघरु वाली मोटी पायलें
वो नहीं देती किसी को अधिकार
इन्हें बेड़ियाँ कहने का |

यूँ ही करती हैं ये स्त्रियाँ
अपने समर्पण का ,अपने प्रेम का,अपने जूनून  का
उन्मुक्त प्रदर्शन !!

प्रेम की कोई तय परिभाषा नहीं होती |

-अनुलता-